कविता लिखने की कला

प्रिय मित्र,

जितना मैं जानता हूँ, कविता का सबसे आसान अर्थ है कविता कल्पना और विचार का तालमेल है।

आप समझ गए होंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूँ। दरअसल इस संसार के सभी मनुष्यों के पास कल्पना होती ही है और विचार तो मस्तिष्क की मूलधारा में आता है।

बस बैठिये और कलम उठाइये। और धीरे धीरे आप देखेंगे कि आपने एक कविता लिख ली।

अब अगर आप अच्छी कविता लिखना चाहते है तो आपको अच्छे को पढ़ना भी पड़ेगा। इससे विचार और कल्पना में वृद्धि तो होगी ही साथ ही साथ आपको इनके तालमेल की विधाए भी ज्ञात होंगी।

और मुबारक हो, आप एक अच्छे कवि बन गए हैं।

स्नेहा राजू जी के अनुसार,

“कविता में दो तरह का सौंदर्य मुझे दिखता है –

शब्दों का सौंदर्य और अर्थ का सौंदर्य

शब्दों का सौंदर्य जब आप अभिराम शब्दों को वैसे ही एक साथ नियोजित करें जैसे जड़ाऊ आभूषण बनाने के समय स्वर्णकार अपने रुचिबोध से विविध प्रकार के रत्न सटीक स्थानों में जड़ता है – मोती चारों ओर लगेंगे, बीच में पन्ना और इस को ऐसे मुकुट आकार में मोड़ा जाएगा। शब्दालंकार और ताल का सामंजस्य हो।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की “आये महंत वसंत”

मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला

बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला

चंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत

आए महंत वसंत

श्रद्धानत तरुओं की अंजलि से झरे पात

कोंपल के मुँदे नयन थर-थर-थर पुलक गात

अगरु धूम लिए घूम रहे सुमन दिग-दिगंत

आए महंत वसंत

खड़ खड़ खड़ताल बजा नाच रही बिसुध हवा

डाल डाल अलि पिक के गायन का बँधा समा

तरु तरु की ध्वजा उठी जय जय का है न अंत

आए महंत वसंत

अथवा जयशंकर प्रसाद की “प्रयाणगीत”

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती।

स्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती॥

अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ प्रतिज्ञ सोच लो।

प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो बढ़े चलो॥

असंख्य कीर्ति रश्मियाँ, विकीर्ण दिव्य दाह-सी।

सपूत मातृभूमि के, रुको न शूर साहसी॥

अराति सैन्य सिन्धु में, सुबाड़वाग्नि से जलो।

प्रवीर हो जयी बनो, बढ़े चलो बढ़े चलो।

अर्थ का सौंदर्य हुआ वह जब कवि और आप दोनों एक ही स्थिति के साक्षी हुए पर कवि आपको वह अनुभूति करे जिस गहराई तक पाठक स्वयं गया नहीं। नौ रस भी इसी में आते हैं – वीर, रौद्र, करूण, श्रृंगार, हास्य, भय, जुगुप्सा, आश्चर्य, निर्वेद। रस और भाव में ही कविता के अर्थ का सौंदर्य है।

धूमिल की “लोहे का स्वाद”

शब्द किस तरह

कविता बनते हैं

इसे देखो

अक्षरों के बीच गिरे हुए

आदमी को पढ़ो

क्या तुमने सुना कि यह

लोहे की आवाज है या

मिट्टी में गिरे हुए खून

का रंग”

लोहे का स्वाद

लोहार से मत पूछो

उस घोड़े से पूछो

जिसके मुँह में लगाम है.

या शमशेर बहादुर सिंह की ‘सावन’

मैली, हाथ की धुली खादी –
सा है
आसमान।
जो बादल का पर्दा है वह मटियाला धुँधला-धुँधला
एक-सार फैला है लगभग :
कहीं-कहीं तो जैसे हलका नील दिया हो।
उसकी हलकी-हलकी नीली झाँइयाँ
मिटती बनती बहती चलती हैं। उस
धूमिल अँगनारे के पीछे, वह
मौन गुलाबी झलक
एकाएक उभरकर ठहरी, फिर मद्धिम होकर मिट गयी
जैसे घोल गया हो कोई गँदले जल में
अपने हलकी- मेंहदीवाले हाथ।

मैली मटियाली मिट्टी की चाक
भीगी है पूरब में
…सारे आसमान में।
नीली छाया उसकी चमक रही है
जैसे गीली रेत
(यह जोलाई की पंद्रह तारीख है
बादल का है राज)
– या जैसे, उस फाख्ताम के बाजू के अंदर का रोआँ
कोमल उजला नीला
(कितना स्वाच्छ !)
जिसको उस शाम
हमने मारा था !”

याद रखिये पहला काम है कलम उठाना और कुछ भी लिख देना, बस।

और सब बढियाँ?

आपका अपना,

समोसा

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