छोटे शहर का प्यार

 

मेरी प्यारी बर्फी,

कुतुबखाने से निकलकर घंटाघर के रास्ते कोतवाली से होते हुए आज फिर गुज़रा। पुराने बस अड्डे से आगरा की बस पकड़नी थी। सालों बाद काम के बहाने ही सही मौका तो मिला मुझे वापस आने का, अपने शहर। मेरा शहर जो दिल्ली, मुम्बई जैसा महानगर नहीं था। शहर जो लखनऊ और आगरा जैसे कोई पर्यटन केंद्र भी नहीं है। नहीं है उसमें कोई एयरपोर्ट या कोई बड़ा पांच सितारा होटल। पर आज भी मुझे मेरी बरेली उतनी ही प्यारी है जितना किसी दिल्ली वाले को अपनी दिल्ली प्यारी होती है या प्यारी होता है किसी न्यू यॉर्क की गोरी का को अपना शहर।

chhote shahar ka pyaar

तब तो बरेली में अपार्टमेंट कल्चर शुरू भी नहीं हुआ था जब हम सिविल लाइन्स में मिले पापा के सरकारी घर में रहते थे। दो कमरे, एक लॉबी, किचन और हमारा बड़ा सा अहाता। अहाते में लगा आम का पेड़ आज भी याद है मुझे। दशहरी के आम का वो पेड़ मेरी गर्मियों की छुट्टी का सबसे अच्छा साथी था। घर के बाहर लगा वो नीम का पेड़ भी, जिसकी झुकी हुई डाली पर हम झूला डाल लेते थे। मैं और मेरी बहन उस एक पर्सन की कैपेसिटी वाले झूले पर बैठने के लिए लड़ते रहते थे।

आज जयपुर जैसे बड़े शहर के रिहाइशी इलाके में एक फ्लैट में रहते हुए मुझे याद आता है मेरा वो घर और उस घर की छत, जिसपर मेरा पूरा अधिकार था। वो छत जिसपर मैने उड़ाए थे पतंग। ऐसे ही एक दिन पतंग बगल वाले शर्मा अंकल की छत पर जा गिरी। मैं नीचे गया, दरवाजे पर दस्तक दिया तो अंदर से किसी की आवाज आई, “कौन है?”

“अरे मैं हूँ आन्टी, समोसा!” मैने कहा।

“मैं तुम्हें आंटी दिखती हूँ?” सफेद रंग की फूलों की प्रिंट वाली फ्रॉक पहने हुए तुम गुस्से से लाल आंखों से मुझे घूर रही थी, और मैं बुत बनकर तुम्हें।

“ये शर्मा अंकल के घर में कौन नई बला आ गई?” मैने मन ही मन पूछा। तब तक आंटी निकलीं और बोलीं, “तू इससे भी झगड़ा करने लगी? अरे बेटा! ये मेरी भतीजी है, छुट्टी बिताने आई है। बर्फी! हेलो करो समोसा को।”

“समोसा? कितना फनी नेम है?” तुमने हंसते हुए कहा।

“तो तुम्हारा नाम कौन सा सिंड्रेला है?” मैंने कहा तो चिढ़ में था, पर वो नाम सुनके मेरे कानों में शहद नहीं बर्फी घुल गए थे।

मैं रोज किसी न किसी बहाने से शर्मा अंकल के घर जाता रहा, और तुम रोज किसी न किसी बात पर मुझसे झगडती रही। मुझे पता नहीं कि मुझे प्यार हुआ था कि नहीं क्योंकि वो उम्र प्यार की तो नहीं थी। पर शायद वो उम्र यूहीं बिना किसी बात के झगड़ा करने की भी नहीं थी।

तुमने किसी दिन अपनी बुआ जी से झुमके वाली मार्किट घूमने की जिद की होगी। और तुम्हें वो मार्केट घुमाने की जिम्मेदारी मिली मुझको। घंटाघर के उसी रास्ते में गुजरते हुए मैं तुम्हें बता रहा था कि इसी रास्ते को झुमके वाला रास्ता कहा जाता रहा है और तुम बरेली के सूरमे के नक्काशीदार डिब्बे देखने में खोई हुई थी।

बड़े शहर की इस भागदौड़ में छोटे शहरों की तरह सुस्ताई अलसाई शामें नहीं होती, जिसमें हम सबकुछ भूलकर बस उस पल के साथ होते हैं जिनको हम जी रहे होते हैं। वापस जाते समय दीनानाथ की मशहूर लस्सी जो एकबार मैंने जबरदस्ती पिलाई और उसके बाद 3 और कुल्हड़ तुमने अपने जिद में उछलते हुए पिये, वो मुझे आज भी याद है। याद है कैसे तुमने पांचवा कुल्हड़ भी ले लिया था पर पेट में तुम्हारे जगह नहीं बची तो मुझे पीनी पड़ी तुम्हारी जूठी लस्सी। कसम से, वो लस्सी बर्फी के साथ घुलकर और मीठी हो गई थी।

कितना ही दिन मैं रहा उस शहर में? सिर्फ 16 साल। पर आज भी या तब भी जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा, इस सवाल पर की मैं कहाँ का रहने वाला हूँ, मेरा जवाब हमेशा बरेली ही रहेगा। मेरा छोटा सा शहर, जहां मैं पापा की साइकिल के आगे वाली रॉड पर लगी छोटी सी गद्दी पर बैठकर राजकुमारों की तरह घूमा था। वो शहर, जहां मैंने दोस्तों के साथ कंचे, गिल्ली डंडा और क्रिकेट खेलना सीखा। वो शहर, जो बड़े शहरों से सालों पीछे था, पर मुझे खुशी है कि उस शहर में मैंने मलाई बर्फ खाया है, कचौरियाँ, दही जलेबी, पेड़े और इमरतियाँ खाई हैं। जहां घंटी और पेट्रोमैक्स के साथ, “बच्चों के लिए मज़ेदार खोए की रेवड़ियां!!!!” चिल्लाते जाने वालों से खोए की रेवड़ी खरीद के खाई हैं। शहर जहां बिसाती, जो साइकिल पर रख कर हज़ारों साजो श्रृंगार के सामान, लाली लिपस्टिक, आल्ते महावर से लेकर चूड़ियों तक के साथ कुछ खिलौने भी लाता था, से प्लास्टिक की माउजर वाली बंदूक खरीदने की जिद करने पर मां से खूब मार भी खाया हूँ।

शहर जहाँ मुझे पहला प्यार हुआ। जहां मुझे तुमसे प्यार हुआ। और जहाँ जब पहले प्यार में जब दिल टूटा तो दोस्तों के साथ टपरी पर बैठ कर सिगरेट पहली कश भी मारी। ‘छी! पूरा गला जल गया था मेरा, पीते कैसे हैं लोग?’ कहने वाला मैं सिगरेट की लत भी लगा बैठा। और पापा को जब पता लगा, तो उनकी मार के बाद उनकी आंखों में आंसू देखकर कभी भी कोई नशा न करने की कसम भी मैने खाई।

शहर जहां लगने वाले एक महीने के श्रवण मेले में आस पास के गांवों की भीड़ जमा रहती थी। आज के बच्चों को वो मेले मॉल सरीखे लग सकते हैं, पर मेले में बिकते थे हाथी, घोड़े और ऊंट भी, जो आज कल के मॉल में नहीं मिलते। मेले में लिखे जाते थे चावल के दानों पर नाम। मैनें भी लिखवाया था तुम्हारा और अपना नाम एक साथ एक चावल पर। कैसे भूल जाऊं, अपना छोटा सा शहर?

ये मेरा शहर ही नहीं था, ये मेरी यादों का शहर था। वो चावल का दाना ले आया हूँ वापस। छोड़ दूंगा उसे किसी शिव जी के मंदिर में, मेरे शहर में हैं हर कुछ कदम पर मंदिर।

सब कुछ भूल कर भी न भूलने की जद्दोजहद में,

तुम्हारा,

समोसा

कुछ छूट गया तो जरूर बताएं, अपने शहर की बातें।

Summary
छोटे शहर की कहानी
Article Name
छोटे शहर की कहानी
Description
कुतुबखाने से निकलकर घंटाघर के रास्ते कोतवाली से होते हुए आज फिर गुज़रा। पुराने बस अड्डे से आगरा की बस पकड़नी थी। सालों बाद काम के बहाने ही सही मौका तो मिला मुझे वापस आने का, अपने शहर।
Author
Publisher Name
JoHaiSoHai

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *